अराजकतावाद के सिद्धांत की आलोचना। तथा साम्यवाद व समाजवाद से किस प्रकार भिन्न है?

अराजकतावाद के सिद्धांत की आलोचना । तथा साम्यवाद व समाजवाद से किस प्रकार भिन्न है ?

अराजकतावाद की आलोचना(Criticism of Anarchism)
अराजकतावादी विचारकों के अनुसार राज्य सर्वथा अवांछनीय संस्था है। शक्ति पर आधारित होने के नाते राज्य ‘अनावश्यक बुराई’ है। व्यक्ति स्वभाव से श्रेष्ठ होता है। राज्य में निवास करने के कारण ही उसमें अनेक प्रकार की बुराइयां उत्पन्न होती है। अबाधित रूप में व्यक्ति को अपने विवेक के अनुसार यदि कार्य करने का अवसर प्राप्त हो तो वह शांति व व्यवस्था का निर्माण बिना शासन के भी कर सकता है, वह इच्छा के अनुसार अपने प्रत्येक उद्देश्य की पूर्ति के लिए ऐच्छिक समुदायों का निर्माण करेगा। वह स्वेच्छा से रूचि के अनुसार उत्पादन में सहयोग प्रदान करेगा तथा आवश्यकतानुसार उत्पादित वस्तुओं को प्राप्त कर सकेगा। व्यक्तिगत संपत्ति की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। अराजकता की आलोचना निम्न प्रकार से की जा सकती है-

(1) अनुपयुक्त आधार (Improper Basis) – अराजकतावादियों की यह धारणा सर्वथा भ्रमपूर्ण है कि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ है । इस तथ्य को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि व्यक्ति राज्य व उनकी संस्थाओं के कारण भ्रष्ट हो जाता है । प्रत्येक व्यक्ति गुण-दोष पूर्ण है । एक गुण की प्रधानता का अर्थ अवगुणों का सर्वथा अभाव नहीं है । अतः इस धारणा को मानकर समाज की रचना की कल्पना नहीं की जा सकती है । दूसरे, इस तथ्य को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता कि प्रत्येक व्यक्ति स्वेच्छा से उत्पादन में सहयोग देगा, दंड के अभाव में वह आलस्य का परिचय नहीं देगा । ऐसा विचार निश्चित रूप से कल्पना जगत में संभव हो सकता है, व्यावहारिक जगत में नहीं और यदि व्यक्ति को कार्य करने के लिए बाध्य किया गया तो ‘बाधिता का सिद्धांत’ स्वत: अराजकतावादी समाज में प्रविष्ट हो जाएगा । शक्ति का प्रयोग भी ‘बाधित सिद्धांत’ की स्वाभाविक मांग होगी । जहां भी दो व्यक्ति एक साथ रहने का विचार करते हैं, व्यवस्था की आवश्यकता होती है, नियमों का निर्माण होता है, नियम पालन करने को बाध्य किए जाने की व्यवस्था की जाती है, यही शासन है संयुक्त प्रयत्नों की पूर्ति शासन के अभाव में असंभव है, अव्यवहारिक है ।

(2) राज्य आवश्यक तथा उपयोगी है (State is Indispensable and Useful) – अराजकतावादियों की यह धारणा भी उचित प्रतीत नहीं होती कि शक्ति पर आधारित होने के कारण राज्य अनुपयोगी तथा अनावश्यक है । वह अनिष्ट का प्रतीक है, अतः उसे अपनी मृत्यु का आदेश स्वयं ही हस्ताक्षर करके दे देना चाहिए । ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि राज्य ने अपनी उपादेयता को प्रगट कर दिया है । वर्तमान युग में राज्य के कार्य क्षेत्र के विस्तृत हो जाने पर तथा वैज्ञानिक युग की उपस्थिति में राज्य की उपयोगिता को चुनौती नहीं दी जा सकती है ।

(3) राज्यहीन समाज की स्थापना स्वप्न है (Stateless Society Only A Utopia) – अराजकतावादियों की यह धारणा कि राज्यहीन समाज की स्थापना हो सकती है, सर्वथा अव्यवहारिक है, ऐसे समाज की कल्पना की जा सकती है, वास्तविक जगत में यह संभव नहीं है । निस्संदेह केंद्रित शक्ति के अत्यधिक प्रयोग से व्यक्ति के विकास में बाधा पहुंचती है परन्तु इसका अर्थ निश्चित रूप से यह नहीं है की शक्ति को केंद्रित न रख कर पृथक्-पृथक् व्यक्तियों में विभक्त कर दिया जाए । शक्ति का विकेंद्रीकरण आवश्यक है, विकेंद्रीकरण का अर्थ विनाश नहीं होना चाहिए । समाज के अनेक समुदायों में शक्ति का विभाजन हो, यह तो ठीक है, परन्तु उनमें समन्वय स्थापित करने के लिए एक केंद्रीय सत्ता की आवश्यकता बनी ही रहेगी । अतः राज्य स्वाभाविक रूप से आवश्यक है तथा सत्ता विहीन समाज की स्थापना संभव नहीं है ।

(4) समस्त उद्देश्यों के निमित्त ऐच्छिक समुदाय असंभव है (It is impossible to form Voluntary Association for all the Objectives) – अराजकतावादियों की मान्यता यह है कि राज्यहीन समाज में अनेक ऐच्छिक समुदायों का संगठन होगा तथा प्रत्येक समुदाय पृथक उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील होगा । इस मान्यता को स्वीकार करने से अनेक समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं ? क्या एक व्यक्ति अनेक ऐच्छिक समुदायों का सदस्य, बन सकेगा अथवा नहीं ? यदि इसका उत्तर सकारात्मक है तब क्या सभी समुदायों के प्रति उसकी निष्ठा समाप्त हो सकेगी । यदि निष्ठाओं में संघर्ष होगा तो उसका समाधान किस प्रकार संभव हो सकेगा । निश्चित ही राज्य के अभाव में निष्ठाओं में समन्वय न हो सकेगा । निष्ठा संघर्ष उसकी शक्ति को नष्ट कर देगा । सम्भवतः ऐसी अवस्था में व्यक्ति उस कार्य को भी न कर पाए जो उसकी रूचि का हो अतः रचनात्मक कार्यों की गति मंत्र ही हो जाएगी ।

(5) समाज का विकास अराजकतावाद की दिशा में हो रहा है, यह सत्य नहीं है (The Statement that Society is Developing towards Anarchy is incorrect) – क्राप्टकिन की यह मान्यता सत्य के परे है कि समाज का विकास अराजकतावाद की दिशा में हो रहा है । इसके सर्वथा विपरीत प्रत्येक राज्य का कार्य-क्षेत्र अत्यंत व्यापक हो रहा है । अनेक ऐच्छिक संगठनों का निर्माण हो रहा है परंतु अन्ततोगत्वा राज्य की आवश्यकता को सभी अनुभव करते हैं । उसकी उपादेयता स्वयं सिद्ध है तथा अनुभव की वस्तु है ।

(6) अराजकतावादी साधन हिंसात्मक है (Anarchistic Means are Violent) – अराजकतावादी अपने ध्येय की प्राप्ति अर्थात् वर्गहीन, राज्य विहीन व धर्म विहीन राज्य की स्थापना के लिए हिंसात्मक साधनों का भी प्रयोग उचित बताते हैं । वस्तुत: जिस समाज की रचना का आधार अनिच्छा, शक्ति प्रयोग द्वारा बरबस थोपना तथा हिंसा है, उस समाज का स्वरूप क्या होगा ?
निष्कर्ष (Conclusion) – अराजकतावादी स्वतंत्रता पर विशेष बल देते हैं । वे व्यवस्था का विरोध नहीं करते हैं । उनका विरोध शक्ति प्रयोग से है । निस्संदेह शक्ति प्रयोग से व्यक्ति में विकार उत्पन्न हो जाते हैं । वर्तमान युग में राज्य के व्यापक कार्य-क्षेत्र में राज्य का हस्तक्षेप अत्यधिक हो गया है । अतः व्यक्ति की स्वतंत्रता पर बल देने का कार्य स्तुत्य है । इस दृष्टि से अराजकतावाद का अपना मूल्य है । अन्य मान्यताओं से सहमत होना संभव नहीं है ।

अराजकतावाद व साम्यवाद में अंतर(Difference Between Anarchism and Communism)
यद्यपि अराजकतावादियों तथा साम्यवादियों का अंतिम उद्देश्य राज्यहीन व वर्गहीन समाज की रचना करना ही है । परंतु इन दोनों विचारधाराओं के मध्य स्पष्ट अंतर है । यह अंतर निम्न प्रकार व्यक्त किया जा सकता है –

(1) अधिनायकवाद (Dictatorship) – साम्यवादी विचारधारा में साम्यवादी समाज की स्थापना के पूर्व श्रमिकों के अधिनायक (Dictatorship of the proletariat) की स्थापना आवश्यक है । इसके विपरीत अराजकतावादियों का कथन है कि स्वतंत्रता, सहयोग तथा न्याय पर आधारित समाज की रचना बलपूर्वक नहीं की जा सकती है । इसमें संदेह नहीं कि वे हिंसात्मक साधनों को मान्यता देते हैं किंतु अधिनायकवाद का प्रतिपादन वे किसी रूप में करने को प्रस्तुत नहीं है ।

(2) राज्य का अस्तित्व (Existence of the State) – अराजकतावादी राज्यहीन समाज में विश्वास करते हैं । किसी भी दशा में अथवा किसी भी उद्देश्य से वे राज्य के अस्तित्व के विरोधी हैं । इसके विपरीत साम्यवादी, साम्यवादी समाज की रचना तक राज्य के अस्तित्व को सहन नहीं करते, अपितु उसे साधन मानकर वर्गहीन समाज की रचना में सहयोग को अपेक्षित समझते हैं । पूंजीवादी व्यवस्था को नष्ट करके राज्य स्वयं ही ‘झर’ जाएगा ।

(3) स्वतंत्रता (Liberty) – अराजकतावादियों की दृष्टि में स्वतंत्रता सर्वोपरि है । वे अराजकतावादि समाज की रचना के लिए भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को नष्ट करने के पक्षपाती नहीं हैं ।इसके विपरीत साम्यवादी स्थ्यन्तर काल (Transitory period) में श्रमिकों के अधिनायकवाद की स्थापना करने के पक्ष में है । उस काल में सैद्धांतिक रूप से वे व्यक्ति के अधिकारों व स्वतंत्रता का दमन करना उचित समझते हैं ।

(4) साधन व साध्य (Means and Ends) – अराजकतावादी साधन साध्य में साम्य चाहते हैं, इसके विपरीत साम्यवादियों की दृष्टि में ध्येय की प्राप्ति में साधनों की चिंता नहीं करनी चाहिए । अंतरिम काल के कष्टों को सहन करना भी उचित ही होगा ।

(5) श्रमिकों का स्थान (Place of Labourers) – साम्यवादी तो आज के श्रमिकों को स्वामित्व प्रदान करने की कल्पना करते हैं । अतः वर्ग संबंध में परिवर्तन ही उचित समझते हैं । अराजकतावादी सामाजिक अवस्था में आमूल परिवर्तन करना चाहते हैं । वे श्रम व बाधिता का परित्याग कर सहयोग के आधार पर ऐच्छिक समुदायों का निर्माण करने का स्वप्न देखते हैं ।

(6) कठोरता (Rigidity) – साम्यवाद में कठोरता एवं दृढ़ता पाई जाती है किन्तु अराजकतावाद में उसका अभाव है ।

(7) बल प्रयोग (Use of Force) – साम्यवाद का अधिनायकवाद बल प्रयोग द्वारा सम्भव है किन्तु अराजकतावाद बल प्रयोग में विश्वास नहीं करता है ।

(8) सत्ता (Authority) – अराजकतावादी विचारक सत्ता के विरोधी हैं । उनका कहना है कि सत्ता व्यक्तियों को पतित करती है, किंतु साम्यवादी सत्ता के पक्षपाती हैं । वे पूंजीपति वर्ग की सत्ता की समाप्ति के बाद श्री श्रमिक वर्ग की सत्ता का समर्थन करते हैं ।

(10) विकेंद्रीकरण (Centralisation) – अराजकतावादी विभिन्न समुदायों को सत्ता देकर विकेंद्रीयकरण की नीति का पक्षपात करते हैं किंतु साम्यवादी केंद्रीयकरण की नीति पर बल देते हैं ।

अराजकतावाद व समाजवाद(Anarchism and Socialism)

दोनों के मध्य निम्नलिखित समानताएं तथा असमानताएं हैं-
(1) स्वतंत्रता (Liberty) – अराजकतावादी व्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वोपरि कहते हैं और उनकी दृष्टि में स्वतंत्रता का अर्थ है, प्रतिबंधों का अभाव । समाजवादी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर बल देते हैं परंतु उनकी स्वतंत्रता सकारात्मक स्वतंत्रता है । इसका अर्थ यह हुआ कि समाजवादियों की दृष्टि में प्रतिबंध का अभाव स्वतंत्रता नहीं है, अपितु स्वतंत्रता का अर्थ उन दशाओं से है, जिनमें व्यक्ति चिंताओं से मुक्त रहकर नियमानुसार अबाधित जीवन व्यतीत कर सके ।

(2) राज्य की स्थिति (Position of the State) – अराजकतावादी राज्य को शक्ति का प्रतिरूप समझते हैं, उसे अनावश्यक अथवा बुरा मानते हैं । राज्य के अस्तित्व को वे किसी भी दशा में स्वीकार करने को प्रस्तुत नहीं हैं । इसके विपरीत समाजवादी राज्य को उपयोगी व आवश्यक मानते हैं, क्योंकि वह समाजवादी समाज की रचना व जीवन में महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करने में समर्थ है ।

(3) समाज तथा व्यक्ति के मध्य संबंध (Relations Between Society and Individuals) – समाज तथा व्यक्ति के पारस्परिक सम्बन्धों के आधार पर भी दोनों में अंतर है, समाजवादियों की दृष्टि से व्यक्ति का सच्चा विकास समाज के विकास से सम्बन्धित है । अराजकतावादी व्यक्ति के स्वतंत्र जीवन व नैतिक विकास में समाज का हित देखते हैं ।

अराजकतावाद व श्रम-संघवाद(Anarchism and Guild Socialism)

दोनों के मध्य निम्नलिखित समानताएं तथा असमानताएं हैं-

(1) राज्य (State) – इन दोनों विचारधाराओं में राज्य के प्रति समान दृष्टिकोण है । दोनों का ही राज्य को अनावश्यक तथा अनुपयोगी मानकर उसे समाप्त करने के पक्ष में हैं ।

(2) साधन (Means) – राज्य का अंत करने के लिए साधनों का प्रयोग दोनों ही विचारधाराओं में समान है ।

(3) संगठन (Organization) – कभी-कभी कुछ लेखक श्रमिक संघवाद को संगठित अराजकतावाद भी कह देते हैं ।

(4) भावी समाजवाद (Future Society) – अराजकतावादी व्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता और ऐच्छिक समुदाय के संगठन का उद्देश्य अपने समक्ष रखते हैं । श्रम-संघवाद में भावी समाज का चित्रण विस्तृत रूप से नहीं है, फिर भी वे इतना स्पष्ट करते हैं कि आर्थिक जीवन पर श्रमिकों का नियंत्रण होगा ।

(5) साधन (Means) – क्रांतिकारी तथा अराजकतावादी आतंकवाद व राजनीतिक हत्याओं को साधन रूप में मान्यता प्रदान करते हैं । श्रम-संघवादी सीधी कार्यवाही अर्थात् हड़ताल आदि का समर्थन करते हैं ।

(6) वर्ग (Classes) – अराजकतावाद बुद्धिवादियों द्वारा प्रतिपादित आदर्शवादी विचारधारा है, जबकि श्रम-संघवाद प्रधानत: श्रमिकों का वर्ग- संघर्ष पर आधारित आंदोलन है । अराजकतावाद वर्गहीन राज्य का समर्थक है ।

अराजकतावाद तथा व्यक्तिवाद(Anarchism and Individualism)

दोनों ही विचारधाराओं के विचारक व्यक्ति की स्वतंत्रता पर विशेष बल देते हैं ।दोनों के मध्य अंतर व समानता निम्नलिखित हैं-

(1) राज्य (State) – व्यक्तिवादी राज्य को आवश्यक बुराई मानते हैं । उनकी दृष्टि में बुराई तो है परंतु आवश्यक है । वे उसके कार्यों को समिति करने के पक्ष में हैं । आवश्यक कार्यों के अतिरिक्त अन्य कार्यों में वे हस्तक्षेप सहन करने को प्रस्तुत नहीं । अराजकतावादी राज्य को आवश्यक बुराई कहते हैं । वे उसे किसी भी रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं है । उनके अनुसार राज्य का अंत करके ही बुराइयों का अंत किया जा सकता है ।

(2) व्यक्ति के गुण (Virtues of Individual) – व्यक्तिवादी व्यक्ति को स्वार्थी मानते हैं । उनकी विचारधारा व्यक्तिगत स्वार्थपरता की पोषक रही है । वे निजी संपत्ति, पूंजीवाद, शोषण तथा प्रतिस्पर्धा का विरोध नहीं करते, अपितु उनका समर्थन करते हैं । अराजकतावादी व्यक्ति के स्वाभाविक गुणों पर विश्वास करते हैं और समाज की रचना सहयोग के आधार पर करना चाहते हैं । अतः व्यक्तिगत सम्पत्ति, पूंजीवाद आदि का वे अन्य करना चाहते हैं । उनका अनुमान है कि समाज में सभी व्यक्ति उत्पादन में सहयोग करेंगे तथा सभी आवश्यकताओं के अनुसार वस्तुएं प्राप्त कर सकेंगे ।

 

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